गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009

दो आँखें हैं ....
जो हर वक्त
पीछा करती रहती हैं।
जब मैं सुबह उठती हूँ,
तो लगता हैं कि
परदे के पीछे से
देख रही हैं मुझे।
हर बात जो मैं बोलती हूँ
नाप तौल लेती हूँ उसे ...
क्योंकि नज़र रखी
जा रही हैं मुझपर ।
कल ही तो एक झूठ
निकल गया था मुहं से ,
तो चुभती रही वो आँखें दिनभर ।
वो आँखें ...
'माँ'
क्या तुम्हारी हैं?

अब तक ..

उस राह के ,
उस मोड़ पर,
जहाँ से तुम्हारा सफर
शुरू हुआ था ,
किसी की मंज़िल
वहीँ है अब तक ।
जिसे तुम छोड़ कर
बहुत आगे निकल चुके हो
वह जड़ हो चुकी है
स्तब्ध रह गई है
वहीँ पर अब तक ।
तुम्हारे जीवन नें
अनेक मौसम देखे होंगे ,
कुछ शीत , कुछ बरखा और
कुछ वसंत के
उसके जीवन में लेकिन
पतझर है अबतक ।
तुमने अपना भाग्य
स्वयं अपने हाथों बनाया
पर इस सत्य से तो
तुम भी अनभिज्ञ हो कि
लिखा है किसी और का भाग्य भी
तुमने ही अनजाने में...
जो तुम्हारी प्रतीक्षा को
नीयति मान कर
जी रही है अब तक ।
तो वापस जाओ और
उस पाषाण शिला को
जीवान्वित कर दो ,
शायद उसमें
जीवन जीने के आसार
कुछ बचे हो अब तक।

विवश..

मानव ...
सृष्टा की अमूल्य रचना,
अपनी सीमाओं को पराजित करता
एक आजाद जीव।
जो बड़े से बड़े आकाश को
भी भेद सकता है,
गहरी से गहरी सुरंग
बना सकता है
धरती के गर्भ में।
फ़िर यह कैसी विवशता है ......
कि वाही मानव्
थाह नही पा सकता
अगले मानव् के हिय की।
शायद यही है
मानव् ,तुच्छ मानव्
होने की
विवशता ..... ।

अक्सर आकाश गंगा की
सूनसान किरणों पर खड़े होकर
जब मैंने अथाह शून्य में
अनंत ,प्रदीप्त सूर्यों को
कोहरे की गुफाओं में
पंख टूटे जुगनूओं की तरह
रेंगते देखा है
तो मैं भयभीत होकर
लौट आया हूँ।
-धर्मवीर 'भरती'

रविवार, 30 अगस्त 2009

कवितायें ....

उन लहरों की तरह हैं
जो मन के एक कोने से
उभरती हैं, और
ज़हन के सारे भाव
बहा लाती हैं
आत्मा के किनारे तक।
और छोड़ कर उन्हें
विलीन हो जाती हैं
काल के क्षितिज में.....

रह जाते हैं तो सिर्फ़
रेत के कागज़ पर
उनके आने-जाने के
निशाँ......

मैं अनाथ

मैं .....
अकेला, निहत्था , अनाथ।
मैंने दुनिया से,
और दुनिया ने मुझ से
न कुछ लिया
न दिया...
मुझे अपने साथ ही
हर दिन बीतना होगा
उगना होगा
सुबह के साथ
और भुला देना होगा
उन सभी
तथाकथित दुर्व्यवहारों को...
और यादों को....

क्योंकि अकेले जीना
आसान हो जाएगा
यदि मैं उन के बारे में
सोचना छोड़ सकूँ
यदि मैं चुप रह सकूँ।

क्योंकि मुझे पता है
कि मेरी आवाज़
किसी को
सुनाई नही देगी
और अगर सुनाई दी भी तो
अनसुनी कर दी जायेगी
या भुला दी जायेगी।

मैं पलायनवादी नहीं हूँ...
पर मैं विश्वास करता हूँ
अकेले जीने में
और शायद इसीलिए
मैं ख़ुद के साथ हूँ।




शनिवार, 29 अगस्त 2009

फ़िर एक बार आज...

अभी अभी
एक आवाज़ सी
सुनाई दी
मेरे अंतर्मन से...
जैसे किसी शांत झील में
एक हलचल सी हुई हो
और बिखरी हो सोच की लहरें
हर दिशा में...
फ़िर मैंने महसूस किया
अपने होने को...
लेकिन
क्या सिर्फ़ होना ही काफ़ी है?
यूँ तो जीवित रहना
अर्थहीन, व्यर्थ लगता है।
फ़िर कुछ शिकायतें की मैंने
अपने आप से
मैं रूठी ख़ुद से
मनाया मैंने स्वयं ही
और जगाई एक नन्ही किरण
अपने मन के कोने में।
जैसे किसी पुरानी कुटिया
में किया हो दीपदान।
अपनी उँगलियों के पोरों से
महसूस किया बोझिल पलकों को,
संवारा अपने उलझे बालों को
अपनी उलझी ज़िन्दगी की तरह।
फ़िर एक बार आज
बहुत दिनों बाद
दर्पण को देखा
और देखा मन के कोने में रखा
वो छोटा सा दीप
टिमटिमाता ..अपनी आंखों में ,
फ़िर....
मैंने महसूस किया
अपने जीवित होने को।